Wednesday, 2 November 2011

कायेन वाचा मनसेन्द्रियैर्वा बुध्यात्मना वा प्रकृतेः स्वभावात्।
करोमि यद् यद् संकलं परस्मै नारायणायेति समर्पयामि।।
शरीर से, वाणी से, मन से, इन्द्रियों से, बुद्धि से अथवा प्रकृति के स्वभाव से जो-जो करते हैं वह सब समर्पित करते हैं। हमारे जो कुछ भी कर्म हैं। हे गुरूदेव ! वह सब आपके चरणों में समर्पित हैं.....। हमारा कर्त्तापन का भाव, भोक्तापन का भाव आपके चरणों में समर्पित है।
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