Friday, 4 May 2012

449_THOUGHTS AND QUOTES GIVEN BY PUJYA ASHARAM JI BAPU

'विचारसागर' में यह बात आती है वेदान्त का एक बड़ा ऊँचा ग्रन्थ है 'विचारसागर' । उसमें कहा है कि पहली, दूसरी या तीसरी भूमिका में जिसको भी ब्रह्मज्ञानी गुरु मिल जायें वह ब्रह्मज्ञानी गुरु का ध्यान करे, उनके वचन सुने । उसमें तो यहाँ तक कह दिया है किः
ईश ते अधिक गुरु में धारे भक्ति सुजान
बिव गुरुकृपा प्रवीनहुँ लहे न आतम ज्ञान ।।
ईश्वर से भी ज़्यादा गुरु में प्रेम होना चाहिए । फिर सवाल उठाया गया किः "ईश्वर में प्रेम करने से भी अधिक गुरु में प्रेम करना चाहिए । इससे क्या लाभ होगा?
उत्तर में कहाः 'ईश्वर में प्रेम करके सेवा पूजा करोगो तो हृदय शुद्ध होगा और जीवित महापुरुष में प्रीति करोगे, सेवा-पूजा, ध्यान करोगे तो हृदय तो शुद्ध होगा ही, वे तुम्हारे में कौन सी कमी है वह बताकर ताड़न करके वह गलती निकाल देंगे । मूर्ति तो गलती नहीं निकालेगी । मूर्ति से तुम्हारा भाव शुद्ध होगा परन्तु तुम्हारी क्रिया और ज्ञान की शुद्धि के लिए, अनुमति के लिए मूर्ति क्या करेगी?
 Pujya Asharam Ji Bapu
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