हरिरस
को, हरिज्ञान
को,
हरिविश्रान्ति
को पाये बिना
जिसको बाकी सब
व्यर्थ व्यथा
लगती है, ऐसे
साधक की अनन्य
भक्ति जगती
है। जिसकी
अनन्य भक्ति
है भगवान में,
जिसका अनन्य
योग हो गया है उसको
जनसंपर्क में
रूचि नहीं
रहती।
सामान्य इच्छाओं
को पूर्ण करने
में, सामान्य
भोग भोगने में
जो जीवन नष्ट
करते है, ऐसे
लोगों में
सच्चे भक्त को
रूचि नहीं
होती।
Pujya Asharam Ji Bapu
इच्छा
मात्र, चाहे
वह राजसिक हो
या सात्त्विक हो,
हमको अपने
स्वरूप से दूर
ले जाती है।
ज्ञानवान
इच्छारहित पद
में स्थित
होते हैं।
चिन्ताओं और
कामनाओं के
शान्त होने पर
ही स्वतंत्र
वायुमण्डल का
जन्म होता है।
Pujya Asharam Ji Bapu
मेरा
रोम-रोम संतों
की, गुरू की
कृपा और करूणा
से पवित्र हो
रहा है। आनन्दोऽहम्.....
शान्तोऽहम्.....
शुद्धोऽहम्.....
निर्विकल्पोऽहम्....
निराकारोऽहम्।
मेरा चित्त
प्रसन्न हो
रहा है।
Pujya Asharam Ji Bapu
बीते हुए समय को याद न करना, भविष्य की चिन्ता न करना और वत्तर्मान में प्राप्त सुख-दुःखादि में सम रहना ये जीवनमुक्त पुरुष के लक्षण हैं ।
Pujya Asharam Ji Bapu
ओ मानव ! तू ही अपनी चेतना से सब वस्तुओं को आकर्षक बना देता है ।
अपनी प्यार भरी दृष्टि उन पर डालता है, तब तेरी ही चमक उन पर चढ़
जाती है औरःफिर तू ही उनके प्यार में फ़ँस जाता है ।
Pujya Asharam Ji Bapu