Wednesday, 28 December 2016

1557-Pujya Asaram Bapu Ji-सफलताकी कुंजी

सफलता की कुंजी-  Bapu Ji

ज्ञानपूर्वक अनुभव करो कि मैं किसी भी काल में देह नहीं हूँ और न देह मेरा है। आस्था श्रद्धा श्विष्वास पूर्वक
स्वीकार करो कि अपने में अपने प्रेमास्पद सदैव मौजूद हैं। बस, यही सफलताकी कुंजी है।


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'वहाँ देकर छूटे तो यहाँ फिट हो गये'(बोध कथा)

सुनी है एक सत्य घटनाः
अमदावाद, शाहीबाग में डफनाला के पास हाईकोर्ट के एक जज सुबह में दातुन करते हुए घूमने निकले। नदी की तरफ दो रंगरूट (मनचले) जवान आपस में हँसी मजाक कर रहे थे। एक ने सिगरेट सुलगाने के लिए जज से माचिस माँगी। जज ने इशारे से इनकार कर दिया। थोड़ी देर इधर-उधर टहलकर जज हवा खाने के लिए कहीं बैठ गये, लेकिन उन दोनों को देख ही रहे थे। इतने में वे रंगरूट हँसी-मजाक, तू-तू, मैं-मैं करते हुए लड़ पड़े। एक ने रामपुरी चाकू निकालकर दूसरे शरीर में घुसेड़ दिया, खून कर डाला और पलायन हो गया। जज ने पुलिस को फोन आदि सब किया होगा। खून का केस बना। सेशन कोर्ट से वह केस घूमता घामता कुछ समय के बाद आखिर हाईकोर्ट में उन्हीं जज के पास आया। उन्होंने केस जाँचा तो पता चला कि केस वही है। उस दिन वाली घटना का उन्हें ठीक स्मरण था। उन्होंने अपराधी को देखा तो पाया कि यह उस दिन वाला रंगरूट युवक तो नहीं है।
वे जज कर्मफल के अकाट्य सिद्धान्त को मानने वाले थे। वे समझते थे कि लोभ-रिश्वत या और कोई भी अशुभ कर्म, पापकर्म करते समय तो अच्छा लगता है लेकिन समय पाकर उसका फल भोगना ही पड़ता है। कुछ समय के लिए आदमी किन्ही कारणों से चाहे छूट जाय लेकिन देर-सवेर कर्म का फल उसे मिलता है, मिलता है और मिलता ही है।
जज ने देखा कि यह आदमी को बूढ़ा है जबकि खून करने वाला रंगरूट तो जवान था। उन्होंने बूढ़े को अपने चेम्बर में बुलाया। बूढ़ा रोते-रोते कहने लगाः "साहब ! डफनाला के पास, साबरमती का किनारा... यह सब घटना मैं बिल्कुल जानता ही नहीं हूँ। भगवान की कसम, मैं निर्दोष मारा जा रहा हूँ।"
जज सत्त्वगुणी थे, सज्जन थे, निर्मल विचारों वाले एवं खुले मन के थे, निर्भय थे। निःस्वार्थी और सात्त्विक आदमी निर्भय रहता है। उन्होंने बूढ़े से कहाः "देखो, तुम इस मामले में कुछ नहीं जानते यह ठीक है, लेकिन सेशन कोर्ट में तुम पर यह अपराध बिल्कुल फिट हो गया है। हम तो केवल कानून का पालन करते हैं। अब इसमें हम और कुछ नहीं कर सकते। इस केस में तुम नहीं थे ऐसा तो मैं भी कहता हूँ, फिर भी यह बात उतनी ही निश्चित है कि अगर तुमने जीवनभर कहीं भी किसी इन्सान की हत्या नहीं की होती तो आज सेशन कोर्ट के द्वारा ऐसा सटीक केस तुम पर बैठ नहीं सकता था।
काका ! अब सच बताओ, तुमने कहीं-न-कहीं, कभी-न-कभी, अपनी जवानी में किसी व्यक्ति को मारा था?"
उस बूढ़े ने कबूल करते हुए कहाः "साहब ! अब मेरे आखिरी दिन हैं। आप पूछते हैं तो बता देता हूँ कि आपकी बात सही है। मैंने दो खून किये थे और रिश्वत देकर छूट गया था।"
जज बोलेः "तुम तो देकर छूट गये लेकिन जिन्होंने लिया उनसे फिर उनके बेटे लेंगे, उनकी बेटियाँ लेंगी, कुदरत किसी-न-किसी हिसाब से बदला लेगी। तुम वहाँ देकर छूटे तो यहाँ फिट हो गये। उस समय लगता है कि छूट गये लेकिन कर्म का फल तो देर-सवेर भोगना ही पड़ता है।"
कर्म का फल जब भोगना ही पड़ता है तो क्यों न बढ़िया कर्म करें ताकि बढ़िया फल मिले? बढ़िया कर्म करके फल भगवान को ही क्यों न दे दें ताकि भगवान ही मिल जायें?
नारायण.... नारायण.... नारायण.... नारायण...... नारायण...... नारायण.....


Monday, 26 December 2016

1556- Pujya Asaram Bapu Ji - धर्म विज्ञान का आद्यात्मिक रहस्य

धर्म विज्ञान का आद्यात्मिक रहस्य - Bapu Ji

दूरी के नास में ही ‘योग’ और भेद के नास में ही ‘बोध’ तथा भिन्नता के नास में ही ‘प्रेम’ का प्रादुर्भाव होता है।

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रीछ की योनि से मुक्ति (बोध कथा)


एक बार गुरू गोविन्दसिंह जी के यहाँ एक कलंदर आया। जो रीछ को पकड़कर नचाते हैं, उन्हें कलंदर(मदारी) कहते हैं। उस समय गुरु गोविंदसिंह जी आराम की मुद्रा में बैठे थे और एक सेवक चँवर डुला रहा था। भालू का खेल देखकर वह सेवक खूब हँसा और बोलाः "किस पाप के कारण इसकी यह गति हुई ?"
गुरु गोविन्दसिंह जी ने उससे कहाः "यह तेरा बाप है।"
सेवकः "मैं मनुष्य हूँ, यह रीछ मेरा बाप कैसे ?"
"यह पिछले जन्म में तेरा बाप था। यह गुरु के द्वार तो जाता था लेकिन गुरु का होकर सेवा नहीं करता था। अपना अहं सजाने के लिए, उल्लू सीधा करने के लिए सेवा करता था, इसलिए इसे रीछ बनना पड़ा है।
एक दिन सत्संग पूर्ण होने के बाद प्रसाद बाँटा जा रहा था। इतने में वहाँ से किसान लोग बैलगाड़ियाँ लेकर निकले। उन्हें गुरुजी के दर्शन हो गये। अब गुरुद्वार का एक-एक कौर प्रसाद लेते जायें।' वे बैलगाड़ी से उतरे, बैलों को एक ओर खड़ा किया और इससे बोलेः "हमें प्रसाद दे दो।"
इसने उधर देखा ही नहीं। वे भले गरीब किसान थे लेकिन भक्त थे। उन्होंने दो तीन बार कहा किंतु प्रसाद देना तो दूर बल्कि इसने कहाः 'क्या है ? काले-कलूट रीछ जैसे, बार-बार प्रसाद माँग रहे हो, नहीं है प्रसाद !'
वे बोलेः 'अरे भाई ! एक-एक कण ही दे दो। जिनके हृदय में परमात्मा प्रकट हुए हैं, ऐसे गुरुदेव की नजर प्रसाद पर पड़ी है। ब्रह्मज्ञानी की दृष्टि अमृतवर्षी। थोड़ा सा ही दे दो।'
इसने कहाः 'क्या रीछ की तरह 'दे-दे' कर रहे हो ! जाओ नहीं देता !'
उसमें एक बूढ़ा बुजुर्ग भी था। वह बोलाः 'हमें गुरु के प्रसाद से वंचित करते हो, हम तो रीछ नहीं हैं किंतु जब गुरुसाहब तुम्हें रीछ बनायेंगे तब पता चलेगा !' किसान लोग बददुआ देकर चले गये और कालांतर में तेरा बाप मर कर रीछ बना। फिर भी इसने गुरुद्वार की सेवा की थी, उसी का फल है कि कई रीछ जंगल में भटकते रहते हैं किंतु यह कलंदर के घर आया और यहाँ सिर झुकाने का इसे अवसर मिला है। लाओ, अब इसका गुनाह माफ करते हैं।"
गुरुदेव ने पानी छाँटा। सेवक ने देखा कि गुरुसाहब की कृपा हुई, रीछ के कर्म कट गये और उस नीच चोले से उसका छुटकारा हुआ।

-पूज्य बापू जी के सत्संग-प्रवचन से

Friday, 23 December 2016

1555-सत्यसंक्लप आत्मा तुम्हारे साथ है निर्भय रहो ( Pujya Asaram Bapu Ji ) Hd Wallpaper

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Pujya Asaram Bapu Ji  Hd Wallpaper
सत्यसंक्लप आत्मा तुम्हारे साथ है निर्भय रहो 

( Pujya Asaram Bapu Ji )



हिमालय की तरह दृढ़ होकर अपनी रुकावटों को काटो। यह विश्वास
रखो कि जो सोचूँगा वही हो जाऊँगा। सत्यसंक्लप आत्मा तुम्हारे
साथ है.... नहीं नहीं, तुम ही सत्यसंकल्प आत्मा हो। उठो, अपनी
शक्ति को पहचानो। तमाम शक्तियाँ तुम्हारे साथ हैं।

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क्या आपको पता है ?


फ्रांस के वैज्ञानिक डॉ. एंटोनी बोविस ने बायोमीटर (ऊजा मापक यंत्र) का उपयोग करके वस्तु, व्यक्ति, वनस्पति या स्थान की आभा की तीव्रता मापने की पद्धति खोज निकाली। इस यंत्र द्वारा यह मापा गया कि सात्त्विक जगह और मंत्र का व्यक्ति पर कितना प्रभाव पड़ता है। वैज्ञानिकों ने पाया कि सामान्य, स्वस्थ मनुष्य का ऊर्जा-स्तर 6500 बोविस होता है। पवित्र मंदिर, आश्रम आदि के गर्भगृहों का ऊर्जा-स्तर 11000 बोविस तक होता है। ऐसे स्थानों में जाकर सत्संग, जप, कीर्तन, ध्यान आदि का लाभ ले के अपना ऊर्जा-स्तर बढ़ाने की जो परम्परा अपने देश में है, उसकी अब आधुनिक विज्ञान भी सराहना कर रहा है क्योंकि व्यक्ति का ऊर्जा-स्तर जितना अधिक होता है उतना ही अधिक वह स्वास्थ्य, तंदुरूस्ती, प्रसन्नता का धनी होता है।

ऊर्जा-अध्ययन करते हुए जब वैज्ञानिकों ने ૐकार के जप से उत्पन्न ऊर्जा को मापा तब तो उनके आश्चर्य का ठिकाना ही न रहा क्योंकि यह ऊर्जा 70000 बोविस पायी गयी। और यही कारण है कि ૐकार युक्त सारस्वत्य मंत्र की दीक्षा लेकर जो विद्यार्थी प्रतिदिन कुछ प्राणायाम और जप करते हैं, वे चाहे थके-हारे एवं पिछड़े भी हों तो भी शीघ्र उन्नत हो जाते हैं। ૐकार की महिमा से जपकर्ता को सब तरह से लाभ अधिक है। यदि आपके

Thursday, 22 December 2016

1554-सर्वोत्तम काल कौन सा ( Pujya Asaram Bapu Ji ) Hd Wallpaper


सर्वोत्तम काल कौन सा ( Pujya Asaram Bapu Ji ) Hd Wallpaper


वर्तमान समय को सबसे उत्तम समझो । क्योंकि वर्तमानके सँभल जानेसे बिगड़ा हुआ भूत और
आनेवाला भविष्य अपने आप सँभल जाता है।


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बुराई से मुक्ति (बोधकथा)


अक्सर लोग गुरुनानक देव जी  के पास आते और अपनी समस्याएं उनको बताकर समाधान चाहते। एक डाकू रोज डाका डालता, लेकिन धीरे-धीरे वह अपने इस जीवन से परेशान हो गया। वह डाका डालने से ग्लानि महसूस करने लगा। एक दिन वह गुरुनानक के पास गया और उनके चरणों में गिर कर बोला, ‘महाराज, मैं अपने जीवन से तंग आ गया हूं। जाने कितनों को मैंने लूट कर दुखी किया है। आप ही मुझे कोई रास्ता बताइए, जिससे मैं इस बुराई से बच सकूं।’ नानक जी  बोले, ‘इसमें कौन-सी बड़ी बात है? तुम बुराई करना छोड़ दो तो उससे बच जाओगे।’

डाकू ने उनकी बात सुनी और कहा, ‘अच्छी बात है। मैं कोशिश करूंगा।’ थोड़े दिन बाद वह पुनः लौट कर गुरुनानक के पास आया और बोला, ‘गुरुजी, मैंने बुराई को छोड़ने की बहुत कोशिश की, लेकिन नहीं छोड़ पाया। मैं अपनी आदत से लाचार हूं। मुझे और कोई रास्ता बताएं। कोई भी बुराई हो या आदत, इतना आसान नहीं होता उससे मुक्ति पाना।’ उसकी भावना को देखते हुए गुरुनानक ने कहा, ‘ऐसा करो कि तुम्हारे मन में जो भी बात उठे, उसे कर डालो, लेकिन हर दिन उसे दूसरे लोगों से जरूर कह दो।’

डाकू बहुत खुश हुआ कि अब वह बेधड़क डाका डालेगा और दूसरों से कह कर मन हल्का कर लेगा। कुछ दिन बीतने के बाद वह फिर गुरुनानक जी  के पास पहुंचा और बोला, ‘गुरुजी, बुरा काम करना जितना मुश्किल है, उससे कहीं अधिक मुश्किल है दूसरों के सामने अपनी बुराइयों को कहना। इसलिए दोनों में से मैंने सबसे आसान रास्ता चुना है और डाका डालना ही छोड़ दिया है।’ बुराइयों को स्वीकार करने से बेहतर उनका त्याग है। बुराइयों को स्वीकार से मन हल्का तो होता है, लेकिन अपराध भाव से पूर्ण रूप से मुक्ति नहीं मिल पाती। पूर्ण मुक्ति त्याग में ही निहित है।


Sunday, 18 December 2016

1553-सावधान रहें ( Pujya Asaram Bapu Ji ) Hd Wallpaper


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सावधान रहें ❘❘ Pujya Asaram Bapu Ji ❘❘ 

जो हो रहा है, उसमें सभी का हित विद्यमान है। अतः ‘होने में प्रसन्न तथा करनेमें सावधान’ रहनेके
लिये सतत प्रयत्नशील रहना चाहिये।


मैं झूठ की जीत स्वीकार नहीं करूँगा (बोधकथा)


बात उन दिनों की है जब श्री गोपालस्वरूप पाठक इलाहाबाद में वकालत करते थे। उन्होंने अपने मार्गदर्शक महामना पं. मदनमोहन मालवीय जी से प्रेरणा ली थी कि वे कभी झूठ नहीं बोलेंगे और न किसी को धोखा देंगे।

एक बार पाठक जी के पास सम्पत्ति के विवाद का मुकद्दमा आया। उन्होंने अपने मुवक्किल से दस्तावेज माँगे। उसने कह दिया कि कागजात कुछ दिन बाद देगा। श्री पाठक ने न्यायाधीश के समक्ष जोरदार पैरवी की। उनके तर्कों से सहमत होकर न्यायाधीश ने उनके पक्ष में निर्णय लिख दिया किंतु निर्णय अगले दिन सुनाने वाले थे।

मुवक्किल मिठाई का डिब्बा तथा उपहार लेकर पाठक जी की कोठी पर पहुँचा। बातचीत में उसके मुख से निकल गया कि दस्तावेज फर्जी थे। यह सुनते ही पाठकजी न्यायाधीश के पास जा पहुँचे, बोलेः “महोदय, मैंने भ्रमवश न्यायालय को गुमराह किया है। मैं झूठ की जीत स्वीकार नहीं करूँगा। आप निर्णय बदलने की कृपा करें।”

न्यायाधीश इस अनूठे वकील के सत्याचरण को देखकर हतप्रभ रह गये।

कैसे सत्यप्रेमी वकील ! किसी निरपराध को झूठे तर्कों के आधार पर दंड दिलाना वे अनैतिकता और अधर्म मानते थे। धन के लालच में अन्याय का पक्ष लेने को वे कभी तैयार नहीं हुए। भारत का यह सौभाग्य ही रहा कि ऐसे सत्यनिष्ठ व्यक्ति ने आगे चलकर इस देश के उपराष्ट्रपति पद को गौरवान्वित किया।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, नवम्बर 2016, पृष्ठ संख्या 10 अंक 287


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