अपने को दीन-हीन मान बैठे तो विश्व में ऐसी कोई सत्ता नहीं जो तुम्हें ऊपर उठा सके। अपने आत्मस्वरूप में प्रतिष्ठित हो गये तो त्रिलोकी में ऐसी कोई हस्ती नहीं जो तुम्हें दबा सके।
मन को उदास मत करो। सदैव प्रसन्नमुख रहो। हँसमुख रहो। तुम आनन्दस्वरूप हो। भय, शोक, चिन्ता आदि ने तुम्हारे लिए जन्म ही नहीं लिया है, ऐसी दृढ़ निष्ठा के साथ सदैव अपने आत्मभाव में स्थिर रहो।
ऐसा कौन है
जो तुम्हें
दुःखी कर सके? तुम
यदि न चाहो तो दुःखों की
क्या मजाल
है जो
तुम्हारा
स्पर्श भी कर
सके?
अनन्त-अनन्त
ब्रह्माण्ड
को जो चला रहा
है वह चेतन तुम्हीं
हो।